किसी की शादमानी चींख में तब्दील कर के भी,
नहीं तू सोचता तुझमे बसा शैतान कितना है।
कभी देखो उठा कर आँख तुम भी अर्श की ज़ानिब,
तेरा मालिक़ भी अब तुझसे हैरान कितना है।
कहें किससे ,कहाँ डालें हम इंसाफ़ की अर्ज़ी,
सियासी महकमों में अब बचा ईमान कितना है।
निगाहें भी मेरी ज़िल्लत से अब उठती नहीं सादिक़,
हूँ मैं भी मर्द,मुझपे सबका बस इलज़ाम इतना है।


