किसको अपना कहूँ किसको बेगाना तुम ही कहो,
अब भरोसा तो किसी का भी नहीं छोड़ा है।।
अब ज़माने में कैसे ढोऊँगी लानत सब के,
जो दुआ देते थे वो उँगलियाँ उठाएंगे।
मैन तो जिंदगी तुमको समर्पित की थी,
इसको भी लोग मेरी कमी बताएंगे।
इससे तो अच्छा था कि मौत मुझको आ जाती,
तुमने बाइज़्ज़त मरने का तरीका भी नही छोड़ा है।।
हमने तो बस वफ़ा ईमान अपना समझ था,
तुम्हारी धड़कनों में जान अपना समझा था।
मुझमे डूब कर जो तुम कहानी लिखते रहे,
हमने तो उसको भी उनवान अपना समझ था।
कहो किस लहज़े में अब बात तुमसे की जाए,
तुमने मोहब्बत का सलीका भी नही छोड़ा है।।


