कुछ सवाल जो मैं पूछता हूँ अपने आप से, कुछ जवाब तो आते हैं कुछ नहीं आते। वही सवाल जब मैं पूछता हूँ तुमसे बेधड़क, कई इलज़ाम मेरे सर मढ़ दिए जाते। येही वो तुम हो जो मेरी तरह ही सोचा करते थे, मेरी बेचैनी को अब क्यों समझ नहीं पाते। कुछ जवाब जो मैं दे नहीं पाया कभी ख़ुद से, उसी जवाब की उम्मीद थी, तुम काश कह जाते। जहाँ होली दिवाली ईद तक सब साथ मानती थी, मुझे तुम फिर सुपुर्दे ख़ाक करने क्यों नहीं आते जिन्होंने गालियां दीं मेरी माँ को,बहन और भाई को, क्यों उसकी सोच को तुम जग में नंगा कर नहीं जाते। यही सवाल मेरे सीने पे एक बोझ जैसा है, लगा कर सीने से क्यों इसको हल्का कर नहीं जाते। भलाई बस इसी में है कि मैं ख़ामोश ही बैठूँ, क्यूँ आकर के भरम तुम दूर सादिक़ कर नहीं जाते।।