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ख्वाहिश


दो पल भी मेरे लब पे तबस्सुम नहीं रही, मरते घड़ी या जब तक मेरी ज़िंदगी रही। इक आख़री थी ख्वाहिश कि हँस लूँ मैं थोड़ा सा, मर के भी मेरी ख्वाहिश पूरी न हो सकी।।

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