वो खुला चिलमन
स्तब्ध से हम
वो घटा सी आँखे
निःशब्द थे हम।
वक़्त तो वाज़िब था
आने का उसके
बस खुदा की नेमत
बेवक़्त थे हम ।
बीती शाम चौक पे
देखा उसे
चिलमन के परे
निहारा था जिसे।
आंखों में चाँदनी
समेटे हुये
मुस्कानों के
जवाब देते हुये।
हर पल तुम्हें
पन्नों में देखा
जज्बातों को मुश्किलों
से खत में समेटा ।
जब बयान करने की
हिमाकत की
पर गुम थे
तुम
फिर बेवक़्त
थे हम ।