मैं आजादी..…....

वही जिसे तथागत ने खोजा था वनों मे

फिर कहा - जहाँ तृष्णा वहाँ मैं नही


मैं आजादी ....…...

जिसे कलिंग में अशोक ने कर दिया रंजीत

अपनी संगीनों से

फिर कहा कि ऐसा कुछ भी नही

जो अधीनस्त नही


लेकिन खुद से पराजित अशोक ने

मुझे खोज , सारनाथ ,साँची के स्तूपों में

पाया मुझे मानवता मे, बुद्ध में, दया में प्रेम में


मैं आजादी ..….

जब गांधी ने मुझे अहिंसा समझा

तो भगत सिंह ने मुझे बहरो को सुनाने की आवाज समझा

लक्ष्मीबाई ने मुझे अपनी झांसी की शान

और प्राणों से अधिक समझा


मैं आजादी ......

शायद में उपसर्ग हु शांति की

ऐसी शांति जो अक्सर आयी है गहन अशांति से .…।