अमर हुआ हर कतरा उस लहू का टपका सींचने जो मिट्टी वतन की |   बढ़कर बशर या फिर खुदा से इज्ज़त है तेरे हर जतन की |   कर गुज़रा जो तू ज़िन्दगी में अपनी , मर कर सदा ज़िन्दा रहेगा अपनाया जो ना नक्श-ए-सिफ़त तेरा, ताउम्र ‘सचिंत’ शर्मिंदा रहेगा ||