बहुत ख़ौफ़ है इस जहाँ में फैली एक बवा का लेकिन....
इससे ज्यादा ख़ौफ़ तो तेरे जाने का रहता है....
बतालाओ अब कौन शख्श इंसाफ करेगा मेरा यहाँ....
मुंसिफ ही मेरा जब मेरे मुज़रिम के घर में रहता है.....
कैसे बताऊं पता तुम्हारा इस डाकिये को अब मैं....
कि तू अब सिर्फ़ मेरी डायरी के पन्नों में रहता है....
मेरे हरे-भरे घरौंदे को छोड़कर ऐ दोस्त....
तू अब किस गली, किस दिल में रहता है....
तेरे दरख़्त में डालियाँ बहुत है, मजबूत है, खिलती हैं...
इसलिए तो वहां पंछियों का एक कारवाँ सा रहता है...
मेरे सूखे से ठूंठे में जान न बाकी, जोर न बाकी...
लेकिन फिर भी एक मुसाफिर उसपर बैठा रहता है...
जब भी होती है महफ़िल में वफ़ा की बातें बड़ी बड़ी...
तू क्यों इतनी शिद्दत से सिर को लटकाए रहता है...
खड़ा हुआ है एक फ़रिश्ता आगे जाकर चौक पर....
वो पथिकों को सहज रूप से, राहें भटकाते रहता है।


