तर्क जबसे जवाँ हो गए, भाव जाने कहाँ खो गए।

तुम गए जो नींद से मेरी, ख़्वाब मेरे सारे सो गए।

पहले जनाज़ों में कतारें थीं, अब कतारों में जनाज़े गए।

आदमी से धोखे खाये आदमी, अब कुत्ते पालने लग गए।

तू मेरा, मैं तेरा सहारा हूँ बोल, सारे दुश्मन, दोस्त हो गए।

कौन दे रोज़ तुलसी को जल, इसलिए तो कैक्टस बो गए।

कहाँ से आये हवा अब जब, सब बनावटी से हो गए। 

जीव होकर भी ये कातिल, जीव को ही खा गए।

इंसान को यूँ मजबूर पाकर, कुछ इंसान गिद्ध हो गए।

प्रकृति का ये हश्र देखकर, महाकाल क्रुद्ध हो गए।