जीवन के इस कठिन समय के पथ पर चलता जा रहा हूँ मैं...

अरे रुको, ज़रा ठहरो, तुम्हे एक अफ़साना सुना रहा हूँ मैं.....

एक ही तो जां से प्यारा परिंदा था दोस्ती की कैद में...

उसे भी आज यूँ आजाद कर उड़ा रहा हूँ मैं....

ज़मीं है,आसमाँ है,रुत है,बादल है,हवा है इन नज़ारों में...

फिर भी सुकूँ की आपाधापी में क्यों लगा हूँ मैं....

नर-भुजंग के गरल-बाण को सहता अपनी पीठों पर...

कुछ के फन को कुचल-कुचल कर देख रहा हूँ मैं....

सत्ता के सिंघासन पर बैठे मायावी, ये बड़े घाघ है...

वोट बड़ा या आदमी..? बस यही सोच रहा हूँ मैं....

सोच रहा हूँ, देख रहा हूँ, सुना रहा हूँ मैं......

आदमी यहाँ बस आंकड़ा है, ये बता रहा हूँ मैं......

इसका हिसाब देना होगा, इसका जवाब देना होगा...

सत्ता के इन गिद्धों को, ये समझा रहा हूँ मैं......