जून की तपती धूप में पेड़ की छांव का सहारा मिल गया,


रेगिस्तान के एक प्यासे को जैसे एक बूंद का सहारा मिल गया,


तेरे बिना महफिल बहुत सुनी सुनी लग रही थी राजा,


जैसे ही तु आया, महफ़िल को भी महफिल होने का नजारा मिल गया।


sachin khatri (raja)