मेरे सपनो मे मुझे एक खिड़की दिखाई देती है
और उस खिड़की मे मुझे तुम।
उस खिड़की पे बैठे,
कभी तुम चाय की चुस्कियां लेते खो जाती हो
कभी कुछ लिखते पढ़ते तुम सो जाती हो
कभी तुम अपने बालों को संवारती हो
कभी गुम सी तुम खिड़की पे देर तक बैठे
पेड़ पंछियों को ताकती हो
और कभी खुद से बातें कर
तुम खुद मे ही मुस्कुराती हो
तुम्हे मुस्कराता देख
मैं भी खुश हो जाता हूं
कभी तुम भी मुझे देख सकों
इस आस मे! मैं रह जाता हूं
पर वो खिड़की और तुमहै
रोज देखूं सपने मे
इस ख्याल मे! मैं सो जाता हूं
तुम बस इतना कर दिया करो
उस खिड़की को खुला छोड़ दिया करो।


