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नया कवि : आत्म-स्वीकार - अज्ञेय

किसी का सत्य था, मैंने संदर्भ में जोड़ दिया । कोई मधुकोष काट लाया था, मैंने निचोड़ लिया । किसी की उक्ति में गरिमा थी मैंने उसे थोड़ा-सा संवार दिया, किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था मैंने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया । कोई हुनरमन्द था: मैंने देखा और कहा, 'यों!' थका भारवाही पाया - घुड़का या कोंच दिया, 'क्यों!' किसी की पौध थी, मैंने सींची
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