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जो कहा नही गया - अज्ञेय

है,अभी कुछ जो कहा नहीं गया । उठी एक किरण, धायी, क्षितिज को नाप गई, सुख की स्मिति कसक भरी,निर्धन की नैन-कोरों में काँप गई, बच्चे ने किलक भरी, माँ की वह नस-नस में व्याप गई। अधूरी हो पर सहज थी अनुभूति : मेरी लाज मुझे साज बन ढाँप गई- फिर मुझ बेसबरे से रहा नहीं गया। पर कुछ और रहा जो कहा नहीं गया। निर्विकार मरु तक को सींचा है तो क्या? नदी-नाले ताल-कुएँ से पानी उलीचा
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