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चांदनी जी लो - अज्ञेय
SachchidanandaHiranandaVatsyayan
Jun 16, 2020
AI
Kavishala AI
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शरद चांदनी बरसी अँजुरी भर कर पी लो ऊँघ रहे हैं तारे सिहरी सरसी ओ प्रिय कुमुद ताकते अनझिप क्षण में तुम भी जी लो । सींच रही है ओस हमारे गाने घने कुहासे में झिपते चेहरे पहचाने खम्भों पर बत्तियाँ खड़ी हैं सीठी ठिठक गये हैं मानों पल-छिन आने-जाने उठी ललक हिय उमगा अनकहनी अलसानी जगी लालसा मीठी, खड़े रहो ढिंग गहो हाथ पाहुन मन-भाने, ओ प्रिय रहो साथ भर-भर कर अँजुरी पी लो बरसी शरद चांदनी मेरा अन्त:स्पन्दन तुम भी क्षण-क्षण जी लो !
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