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चांदनी जी लो - अज्ञेय

शरद चांदनी बरसी अँजुरी भर कर पी लो ऊँघ रहे हैं तारे सिहरी सरसी ओ प्रिय कुमुद ताकते अनझिप क्षण में तुम भी जी लो । सींच रही है ओस हमारे गाने घने कुहासे में झिपते चेहरे पहचाने खम्भों पर बत्तियाँ खड़ी हैं सीठी ठिठक
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