इतने हुए मकबूल कि गुमनाम हो गए,
ढ़ला आफताब तो हम भी सहर से शाम हो गए।
किस्से हमारे अब तो सुनाता है हर बशर,
सारे शहर में इस क़दर बदनाम हो गए।
थे चांद निगाहों के तो हम भी कभी क़ैसर,
उतरे जो फिर ज़मीन पर तो वही आम हो गए।
मायूसियां सताती रही हम को यूं उम्र भर,
निकले जो अपने घर से तो ख़य्याम हो गए।
क्या ज़ुल्म किया इशरत ने न पूछो "मुंतज़िर" हम से,
हाज़त जो आ पड़ी तो सब बेकाम हो गए।


