कि बड़ी संकरी-सी गलियां है मेरे शहर की
गलियों से ज्यादा उनके दिल छोटे हैं
ज़ेबे भरी हुई है,सबकी सिक्कों से,
मगर जब निकाला तो सारे ही खोटे हैं।
जब शहर जलता है जुर्म की आग में ,
तो वे चद्दर तान के सोते हैं।
जब वही वापस आकर उन्हें जलाता है,
तो दोष खुदा का देकर रोते हैं।


