मक़सद है कोई जिनका  कोई उसूल है

मेरी नज़र मैं जीना भी उनका फुज़ूल है 


वो ताज सर का होगा किसी बादशाह का

मेरे लिए तो आज भी पैरो की धूल है


तनहा खड़ा हुआ हूँ मैं मैदान--जंग मैं

लश्कर को लेके आजा अगर दिल मैं भूल है 


कमज़र्फ़ आदमी का तो एहसान भी ना लूँ 

ग़र ज़र्फ़ वाला दे तो ज़हर भी क़ुबूल है 


खुद को भी उसने बेचा है औलाद के लिए 

कहती थी जिसको दुनिया बड़ा बा उसूल है 


कुछ इस लिए भी मैंने मोहब्बत ना की कभी 

सादत वो काम करना ही क्यूँ जो फुज़ूल है