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सिर्फ तुम ही तुम...

मैं जब भी याद करता हूँ सिर्फ तुम ही तुम होती हो कोई और नही,


मैं जब भी बात करता हूँ सिर्फ तुम ही तुम होती हो कोई और नही,


एक दिन सफेद दिख रही थी पड़ियो सी तुम,

मैं भी खुदा समझ बैठा था खुद को।

बादलों की चादर में समेटना चाहा था तुमको।


फिर ऐसा लगा कि तुमने तो मुझे कुछ कहा ही नही।


तुमने तो मुझे चाहा भी नही।



लेकिन मैं जब भी चाहता हूँ सिर्फ तुम ही तुम होती हो कोई और नहीं।


मैं जब भी पुकारता हूँ सिर्फ तुम ही तुम होती हो कोई और नहीं।


एक दिन, बन चांदनी, तुम बरस मोतियों सी रहीं।

मैं भी चाँद बनने चला था, दूर क्यू मुझसे हुई।


फिर ऐसा लगा कि तुमने तो मुझे सुना ही नही।

तुमने तो मुझे देखा भी नही।


लेकिन मैं जब भी देखता हूँ सिर्फ तुम ही तुम होती हो कोई और

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