कहो दिनकर क्यो चुप आज

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चारो ओर कोहराम मचा,

मार्तण्ड फिर भी मौन रहा

तिमिर क्या छा गया है इतना

सहस्रार्चि के वश में ना जितना।

सम रहा ना आज कोई

विषम सभी बन जा चुके

समर चहुं दिखता है केवल

घात सभी हैं खा चुके

राजा पे कलम रुक जाती,

विवश प्रजा हाय क्या करें

निष्ठुर बलि फिर चढ़ जाती

वो वचन कहाँ जाबांज़ हैं

कहो दिनकर क्यो चुप आज हैं


कहीं कोरोना छाई है कोई कहे बलराज है,

मारने मरने पर उतारू दुनिया के धनराज है

बेघर तो फिर भी बेघर है निर्लज्ज तो निर्लाज़ हैं

दूध दूध शिशु बिलख ही रहे स्वान पिये वनराज है

वैभव मद इठलाये कोय भूखे नंगे स्वराज हैं

अस्ताचल में डूब ही गये क्या 

कहो दिनकर क्यो चुप आज हैं


कहीं बेटियां लूट ली जाती कहीं ममता चोट दी जाती,

कहते अरुणाभ किरीट अनल हो,

हिरण्यरेता सप्तसप्ति धिक्कार ओजयौवन को,

कोई भले कुछ ना देखता,

तुम तो सब कुछ रहे देख

सौ सियार भले एक तरफ 

होता सिंह रणराज एक ,

क्या बोटी हुई प्राबल्य छिन्न,

म्रियमाण में भी हुंकार दाह दे 

कहो दिनकर क्यो चुप आज हैं


दीन मजूर कृषकों को पीड़ा 

चलती रहे अमीरों की क्रीड़ा,

अनाचार अपमान हैं सहते 

जो अभ्रष्ट स्वाभिमानी हैं,

लूट देश मस्ती में जीते जो चाक्रिक अपमानी हैं

प्राण गवाये जो मादरे वतन अब

देतें हूक, कब्र से चीख़ें,

कुछ तो हया कर, बेहया अभागे,

क्या इसीलिए हिन्द सींचा है

खून से रंग दी गंगा यमुना

तब आज़ादी छीना है

अंधा चकाचौंध का मारा 

तू तो ब्रितानी से भी अधम हारा

देखें कब होता शंख नाद है 

कहो दिनकर क्यो चुप आज हैं


खून खून के प्यासे बने सब, पी लो अपने ही हृदय का खून, 

क्या पाताल से भी गहरी लालसा,

कि सत्ता करे स्वांग का जलसा

राष्ट्रभक्ति का ढोंग तो ना धरो

कोमल मन मे मोम तो ना भरो

उठाये फिर रहा जो मदिरा भरे 

दृग में तंद्रा का भार,

वह क्या कर सकेगा कभी 

जनता का आभार,क्या बन सकेगा मददगार?

चीरकर फिर दिवा की शांति,

कोकिले छेड़ोगे पंचम तान, 

आज घुमा दो भले हमें तुम,

द्वार आओगे घूम पंचम साल,

किसके घर होगा दृश्य सर्वप्रथम, देवता का रथ अबकी बार

जिसके हेतु करूँ मैं नव स्वागतम मंत्रोच्चार।

क्या भगवन दुःख हरेंगे सबका,

जो करने आये सदाचार है।

मीठी घृत वाणी क्यो बोले, आप तो सिरताज हैं

आज भले लाचार बने ये, कल हम फिर मोहताज़ हैं

कौन सा है ये जीवन कविवर जिसपे करते हम नाज़ हैं

कहो दिनकर क्यो चुप आज हैं


क्या बदला वही लिबास, 

तन भी गोरा और मन काला,

वही लेखनी वही किताब।

वही नियम है वही विधान,

हैं संजोए अटारी भवन वही 

कोई तो होगा नवनिर्माण,

ना लूंगा आज रजत का शंख, 

ना गाऊंगा पौरुष का राग, 

हे माँ जलने दो उर बीच,

कहने दो मुझे बेरोक बेबाक

नही देख सकता जीते जी लूटते तुम्हे दिन रात, 

वेदना भी सहनी पड़े गर, 

आज उगलूँगा गरल कराल।

आज़ाद होके भी झेल रहा विषाद, 

हूँ निरालंब मुफलिस बेरोजगार,

जी करता है खाण्डव वन को कर दूं फिर से स्वाह।

नहीं चाहियें युधिष्ठिर धीर हमें,

दे सके तो दे गांडीव गदा हमें,

लौट आओ अजुन भीम फिर एकबार।

हे शंकर फिर आज करें

वो प्रलय नृत्य एकबार

सारा भारत गूंज उठे, हर हर महादेव महोच्चार,

भारत पवित्र बने सतयुग सा 

यही लक्ष्य अविराज है

दोगे मेरा साथ ज्योतिरकर 

शपथ तुम्हें कविराज है

कहो दिनकर क्यो चुप आज हैं।

©रूपेश सिंह वरेण्य मलय(रूहपेश दिलसे)

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https://youtu.be/CGl1AlVTWgw