कभी कभी हमें उन गलियों से भी प्यार हो जाता है
जहाँ बचपन की शामें बीता करती थी..
लौटा करते थे तब घर...
ओढ़े खिलखिलाहट
खुशियों भरी संदुके लेकर..।
शामें आज भी हुआ करती है
अब हम लौटते हैं..
चारदीवारी में...
रंगमंच पर अदाकारी कर
एकाकी सूनापन लेकर...।
कभी यूँ भी होगा...
जब ये शाम उस शाम से मिलेगी
लौट आयेगी कुछ स्मृतियाँ..
वो बचकानी अल्हड़ सी हँसी
बुत बने इंसान के चेहरे पर..।।
_रुचि सिंह
Twitter- @ruchi_mgr

