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निर्धनता


वो जो दिखते हैं भरी दुपहरीसाँझ सवेरे ..गली गली, नुक्कड़, फ़ुटपाथ व चौराहों परआवाजें लगाते हुए.. कुछ बेचते हुए

दरअसल वे टुकड़े बेच रहे होते हैं,अपने दुखों के..और हम चंद सिक्कों में,उनसे अपनी खुशियां ख़रीद लेते हैं।

_रुचि सिंह

— Twitter- @ruchi_mgr
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