वो जो दिखते हैं भरी दुपहरीसाँझ सवेरे ..गली गली, नुक्कड़, फ़ुटपाथ व चौराहों परआवाजें लगाते हुए.. कुछ बेचते हुएदरअसल वे टुकड़े बेच रहे होते हैं,अपने दुखों के..और हम चंद सिक्कों में,उनसे अपनी खुशियां ख़रीद लेते हैं।_रुचि सिंह
वो जो दिखते हैं भरी दुपहरीसाँझ सवेरे ..गली गली, नुक्कड़, फ़ुटपाथ व चौराहों परआवाजें लगाते हुए.. कुछ बेचते हुए
दरअसल वे टुकड़े बेच रहे होते हैं,अपने दुखों के..और हम चंद सिक्कों में,उनसे अपनी खुशियां ख़रीद लेते हैं।
_रुचि सिंह