औरत सब कुछ समेट लेती है

दांतों से गिरह खोल लेती है..

बच्चो के टूटे खिलौने जोड़ लेती है

शर्ट के कॉलर की बटन 

झट सुई में धागे पिरो 

जोड़ लेती है..

हर रोज टिफिन की

बदलती फरमाइशें

कुकर की सीटियां

दफ्तर की फाइलें

सब समेट लेती है

गमले में उगते पोेधे

बारिश में भीगते कपड़े

टूटे नल को कस कपड़े बांध

मरम्मत कर लेती है

सब समेट लेती है..

वो टूटती है

बिखरती है..

ख़ुद को जोड़ती है...

फ़िर से सब कुछ समेटने के लिए !


_रुचि सिंह

Twitter- @ruchi_mgr