कुछ ज़ख़्म इतने गहरे होते है
कि उनको भरना
वक़्त के बसकी बात नही होती
मोहब्बत और साथ के
मरहम के बिना मुमकिन नही
जब ये नही मिलते
तो ये खुले ज़ख़्म रिसते रहते है
हर पल रिसते रिसते
ये नासूर बन कर कचोटते रहते है
तुम मेरी रूह पे बना
ऐसा ही एक खुला हुआ नासूर हो
जिसे कोई नहीं भर सकता


