काश मैं तुमसे कह पाती ,

काश मैं अपने ख़यालों को बयान कर पाती। 

पर न तुम हो मेरे साथ, न मेरे ख़याल ,

दोनों ही कुछ दूर हैं, कुछ समझ के बाहर भी। 

इंतज़ार मुझे दोनों का है, तुम्हारा शायद कुछ ज़्यादा,

काश यह मैं तुमसे कह पाती। 

तुम प्यार नहीं हो, पर प्यार से काम नहीं हो ,

औरों से कुछ तो अलग हो, पर इतने अलग क्यों?

दिल तो है तुमसे खुलके बातें करू, ज़रूर होंगी कभी,

पर क्या मेरे बिना कहे समझ पाओगे?


काश मैं कुछ बातें समझ पाती,

काश तुम्हारी एहमियत तुम्हे समझा पाती। 

क्यों मुझे इतना पास रखते हो खुदसे ?

क्यों मेरा इतना ख़याल है?

क्यों कहते हो की मेरे हो?

क्यों फिर भी मुझे कम लगता है ?

क्यों कभी हो धड़कन और कभी अनजान?

काश कोई यह मुझे समझा पाता ,

काश वो तुम होते। 


यह वो दिल टूटने के बाद वाली कविता नहीं है,

तुमने कहा लिखो, इसीलिए मैंने लिखा। 

काश मैं तुम्हे यह पढ़ा पाती,

पर कुछ डर तो है। 

काश यह डर ना होता,

काश यह कश्मकश ना होती,

काश कुछ ऐसा न होता,

काश कुछ वैसा होता ।