ज्यों-ज्यों पेड़ कटेंगे, त्यों-त्यों धूप तपेगी
वायु रुठेगी धरती जलेगी मन में रोग बढ़ेंगे
तरसोगें बूंद-बूंद को नहीं मिलेगी फल और छाया
सूख जाऐगें ताल-तलैया सूख जाएंगे नदी और नाले
पशु-पक्षी सब व्याकुल होंगे रे मानव तेरी नियत है काली
ले डूबेगा, इस धरा को तू, संघ अपनी खाक मिटा के
हैं रे मानव, तेरी, लोभी काया अपनी लोभ मिटा दे
पेड़ लगाकर प्राण बचाओ धरती को हरा बना दे !!

