तू किरण बने किसी भोर का
मैं उजियारी साँझ बनूँ
तू बने कोई प्रभाकर सा
मैं तारों में लिपटा चाँद बनूँ..
तू सफर बन चलता जाय
मैं उसमें तेरा हर मोङ बनूँ
तू जब भी ठोकर खा जाय
मैं तेरा वो मरहम बनूँ
तू किरण बने किसी भोर का
मैं उजियारी साँझ बनूँ..
तू जब भी अस्त हो अंतकरण से
मैं आशाओं का सहर बनूँ
तू मन्दता से जब भी भर जाय
मैं उस विटप की इक छाँव बनूँ
तू किरण बने किसी भोर का
मैं उजियारी साँझ बनूँ..
तू सावन की सर्द प्रवात सा
मैं वो पहली मेह बनूँ
तू बन जाय कोई समुंदर सा
मैं उसकी वो गहरान बनूँ
तू किरण बने किसी भोर का
मैं उजियारी साँझ बनूँ...
तू रूठा सा कोई सपना हो
मैं मनाऊँ जिसे अपनों सा
तू ख्वा़बों वाला कोई मोती हो
मैं पाऊँ जिसे हकीकत में
तू किरण बने किसी भोर का
मैं उजियारी साँझ बनूँ...
तू बने कठोर जब तुहिन सा
मैं वारि बन पिघलाऊँ तुझे
लफ्ज़ों से जो ना कह पाये
मैं चक्षु से पढ़ जाऊँ तुझे
तू किरण बने किसी भोर का
मैं उजियारी साँझ बनूँ
तू बने कोई प्रभाकर सा
मैं तारों में लिपटा चाँद बनूँ...


