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तुम प्रेम नहीं कर पाओगे!

मृदु सरिता के मानस कठोर।

मत जल में होकर के विभोर

जल ही समझो अंतर्मन को।

कर भाव-प्रवाहित स्पंदन को,

क्या पुष्प सदृश झर पाओगे?

तुम प्रेम नहीं कर पाओगे!


तुम भावुक पर गंभ

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