मैं छोटा था, सहमा सा था, मंच देख घबराता था,

भीड़-भाड़ की उस दुनिया में, मौन सदा रह जाता था।

पकड़ हाथ खींच लाए आगे, बोले— "उठ हुंकार भर!",

क्षण भर में वो भारी संशय, रण छोड़ दूर भग जाता था।

फिर आया वार्षिक उत्सव तो, मैंने भी हुंकार भरी,

अब काहे का खौफ भला? जब गुरु-कृपा थी साथ खड़ी,

देख विस्मयकारी साहस को, सर ने सिंह-नाद किया,

थपथपा पीठ को बोले— "बढ़, राह खुली है बड़ी-बड़ी!"

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'