जन्म और मृत्यु बस ये दो

समय मैं साथ रहता हूॅं

बाकि ज़िन्दगी तो

तुम ही काम आते हो..

झूठ तुम कितना

साथ निभाते हो ...

घर हो कार्यालय या व्यापार

दोस्त हो या चाहे रिश्तेदार

सबको मूर्ख बनाते हो

झूठ तुम कितना

साथ निभाते हो..

मैं तो रहता हूॅं दबे दबे

बतियाता भी पीछे छिपे

तुम परिस्थिति अनुसार

दलील सुनाते हो

झूठ तुम कितना

साथ निभाते हो..

तारीफ हो या नजरांदाज

देन लेन में भेंट या रिश्वत

हर जगह तुम ही नज़र आते हो

झूठ तुम कितना

साथ निभाते हो..

मुझे भी थोड़ी सी

तक्लीफ सहने दो

मानव के करीब

थोड़ा सा रहने दो

केवल तुम क्यों

भोज उठाते हो

क्यों अकेले

साथ निभाते हो?