काश ऐसा एक दूरबीन होता
जिससे मैं अपने
लाल को देख सकती
दूर से निहार सकती
त्यागा स्वयं को देश के
लिए जिसने उसे ताक
जी भर रो सकती
चैन से एक दिन सो सकती..
काश ऐसा एक दूरबीन होता..
कहने को यंत्रों से
गहरा समन्दर व्याप्त अंबर
सब दिखता है
न जाने मेरा लाल किसके
पीछे जाकर छिपता है
उसकी झलक क्यों सम्भव
नहीं हो सकती
ढूंढा मैनें पूरा आसमान और
ओ धरती...
काश ऐसा एक दूरबीन होता..
उसकी खिलखिलाहट
मैं देख पाती..
संग उसके मैं भी मुस्कुरा पाती
उम्र उसकी थोड़ी और
कयों नहीं बढ़ती
अंतिम श्वास तक स्वयं से
यही कहकर लड़ती..
काश ऐसा एक दूरबीन होता
जिससे मैं अपने
लाल को देख सकती..