ख़्यालों में गुदगुदी की तरह रवाँ हो,
इल्म की सांसें सोख लेते हो,
नज़र की बंसी में फंसते नहीं,
नब्ज़ में कैद करने का कोई ज़रिया नहीं...
मुक़ाम हो तू अगर,
दरम्यां "ब्लैंक स्पेस' से क्यों भरा है??
ख्यालों की कश्ती भी नहीं गुज़र सकती जिससे ।
अपने हथेलियों में
तेरे चेहरे की छुअन,सिहरन
 धड़काने की जुस्तजू करता हूँ।
हो सके तो नाज़ुक लकीर बन
उतर आओ मेरी पेशानी पर,
हथेलियों में,
सरसब्ज़ करने दहकती दहलीज़ को !
मैं बेचश्म,बुद्धू,गवाँर।
यूँ
"ब्रेल लिपि"  में ख़त भेजकर
 इम्तिहान ना लो,
ओ ख़ुदा!