बड़े बेआबरू होकर अब हम तेरी गलियों से निकलते हैं, गर उधर जाते भी हैं तो वहां से दबे-पाँव निकलते हैं | अब न वहां तुम हो,न इश्क़ है बस कुछ तुम्हारे एहसास हैं और एक हम हैं जो बदहवास हैं, कुछ यादें हैं, उन गलियों की जहाँ कभी तुम चला करती थी हमसे मिलने आया करती थी | कुछ किस्से हैं उन गलियों में खड़े इधर-उधर के दीवारों के पास,पेड़ों के पास जिसने हमारी प्यार भरी बातों को सुना था, हमारे मासूम प्यार को देखा था| अब उन गलियों में तुम नहीं दिखती हो पर वो दीवारें,वो पेड़,हमारे प्यार का पहला एहसास अभी भी वहां मुझे मौजूद दिखाई पड़ता है तुम्हारी सूरत तो नहीं दिखाई पड़ती, पर तुम्हारा वज़ूद दिखाई पड़ता है | समय बदला,हम दोनों जुदा हो गए अब जब कभी उन गलियों से गुजरता हूँ तो सोचता हूँ की इश्क़ की शुरुआत हीं अच्छी थी, पहला एहसास हीं ठीक था, कम-से-कम इतना तो होता था की जब भी तेरी गलियों से गुजरते थे, तेरा सूरत-ए-दीदार कर के हीं निकलते थे| यूँ बेआबरू होकर तेरी गलियों से निकलना अब अच्छा नहीं लगता, इसलिए मुझे तेरी गलियों में जाना अब अच्छा नहीं लगता मुझे तेरी गलियों में जाना अब अच्छा नहीं लगता ||