ये ज़िंदगी भी ना जाने
कैसे कैसे रंग दिखलाती है
जिनसे ना मिलना चाहो दोबारा
उन्हीं से बार बार मिलवाती है
हर रोज़ हर क़दम
अपने मुताबिक़ चलाती है
समझ नहीं आता आख़िर
ये करवाना क्या चाहती है
नए नए सवालों में
हर पल उलझाती है
ये ज़िंदगी भी ना जाने
क्यों हरदम आज़माती है
ये ज़िंदगी भी ना जाने
क्यों हरदम आज़माती है
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