लबों पर खामोशियां थी

और आंखें भी थी नम

समझ ना आ रहा था

ये कहां आ गए हम

रुदन की चीखें थी और

उदासियों का था शोर

समझ ना आ रहा था

कौन सा था वो ठौर

उलझनों के धागे थे

और गमों की थी गांठें

नज़दीक जो पहुंचे तो जाना

थी वो ज़िन्दगी की बिछाई बिसातें

नज़दीक जो पहुंचे तो जाना थी वो

ज़िन्दगी की बिछाई बिसातें

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