ज़िन्दगी की कश्मकश में थोड़ा उलझ से गए हैं
कहीं फंस से गए हैं तो कहीं धँस से गए हैं
जज़्बातों और एहसासों की राहों में भटक से गए हैं
कहीं सिमट से गए हैं तो कहीं अटक से गए हैं
ग़लतफ़हमी और बेक़द्री के वारों से टूट से गए हैं
कहीं चिटक से गए हैं तो कहीं बिखर से गए हैं
नजरअंदाजी और खुदगर्ज़ी की लपटों से झुलस से गए हैं
कहीं जल से रहें हैं तो कहीं बुझ से गए हैं
ज़िन्दगी की कश्मकश में थोड़ा उलझ से गए हैं
कहीं घुट से रहें हैं तो कहीं लुट से गए हैं
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