खैरियत अब कोई किसी की पूछता नहीं
हैसियत देख सब माथा टेकते हैं
ये आजकल के रिश्ते हैं साहब
जो दूसरों के दुखों की
आँच पर हाथ सेंकते हैं
रूठने मनाने का अब रिवाज़ कहां
काम आने पर ही घुटने टेकते हैं
ये आजकल के रिश्ते हैं साहब
जो ज़रूरतों के हिसाब से पासे फेकतें हैं
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