यूं तो मुमकिन है हरदम मुस्कुराना
फिर हर बात को तुम यूं
दिल से क्यों लगा लेते हो
इंसान हो साहिब कोई आसमान नहीं
जो हर बात पर आँखें बरसा देते हो
यूं तो मुमकिन है हर बात को
लफ़्ज़ों में सजाना
फिर हर जज़्बात को तुम यूं
होंठों में क्यों दबा लेते हो
जीवित हो साहिब कोई मृत नहीं
जो हरदम ख़ुद को बेजान बना लेते हो
यूं तो मुमकिन है सुकून को गले लगाना
फिर हर दफा क्यों बेचैनियों को अपना लेते हो
आज़ाद हो साहिब कोई गुलाम नहीं
जो हर बार ख़ुद को कैदियों सी सजा देते हो
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