पल भर में जो टूटकर
बिखर जाऊं वो काँच नहीं हूं
नफ़रत की हवाओं से जो
भड़क जाऊं वो आँच नहीं हूं
लफ़्ज़ों की चोट से जो
बदल जाऊं वो मिजाज़ नहीं हूं
तानों की ठेस से जो
टूट जाऊं वो रिवाज़ नहीं हूं
आरोपों के बोझ से जो
दब जाऊं वो कपास नहीं हूं
बिन छुए जो गुज़र
जाऊं वो आभास नहीं हूं
बिन छुए जो गुज़र
जाऊं वो आभास नहीं हूं
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कपास(रुई)


