वक्त तेज़ी से दौड़ता रहा 

और हम समय के साथ गुज़र गए

सपने संजोए थे जो आंखों में

वो ना जाने कब और किधर गए


ज़िंदगी की इस दौड़ में 

इम्तिहानों का दौर चलता रहा

हकीकतों और हसरतों के बीच 

सामंजस्य बैठाने में

हाथों से बहुत कुछ फिसलता रहा


जिम्मेदारियों का बोझ हरपल ढोते रहे

छिप छिप कर आँखें भिगोते रहे

योजनाएं तो बनाई बहुत 

मंजिलों को पाने की

मगर फ़िर भी हर मोड़ पर

कुछ ना कुछ खोते गए

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