वक्त की जमीं पर

कुछ दर्द तो कुछ मुस्कुराहटों के निशान है

अपने दुःख से ज़्यादा

यहां सब औरों के सुख से परेशान हैं


जहां छोड़ रहे हर पल साथ अपने

वहां कंधे से कंधा मिलाकर खड़े अनजान हैं

इंसानों को इतनी तेज़ी से रंग बदलता हुआ देख

आज गिरगिट भी हैरान है


मीठी बातों की चाशनी से खुश

और जहरीले बर्तावों से अंजान हैं

पीठ पीछे वार करने वालों पर फ़िदा

और दिल से अपना मानने वालों से

विमुख होता ना जाने क्यों

हरपल ये इंसान है

हरपल ये इंसान है

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