फिरते हैं दर बदर सुकून की तलाश में

और खुद ही सुकून से दूर जा रहे हैं

अजीब हैं लोग जो ऐश ओ आराम

की चाह में बेचैनियों को पास बुला रहे हैं


ज़्यादा पाने की ख्वाहिश में

अपनी खुशियां गवां रहे हैं

चैन ओ सुकून बेचकर पैसा कमा रहे हैं


करते हैं शिकायत वक्त से

और खुद ही समय गवां रहे हैं

बीत रहे हैं खुद हर क्षण मगर

फिर वही गलती बार बार दोहरा रहे हैं

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