कभी भाई कभी पापा
कभी पति की सुनती रही,,
मन के भीतर सपने हज़ारों
दिन रात वो बुनती रही
कभी ये कभी वो
कभी कुछ कुछ करती रही,,
मन का ख़ुद के करने की खातिर
दिन रात तपती रही
सबकी इच्छाओं
सबकी चाहतों का
ख्याल वो रखती रही,,
भीतर ही भीतर हर लम्हा
खुद में सिमटती रही
बीत गई उम्र आधी
पूछा न किसी ने
फिर भी मन का हाल,,
देख ये चलन सबका
किया उसने ख़ुद से इक सवाल
सारी रोक सारी टोक
सबकुछ सहर्ष स्वीकार किया,,
जी लो तुम भी अपने मुताबिक़
क्यों न किसी ने ये उपहार दिया!!!
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