दर्द तो हर रोज़ गिनते हैं
मगर कभी मुस्कुराहटें नहीं गिनते
शिकायतों को छोड़ कभी
कृतज्ञता की राह क्यों नहीं चुनते
कमियाँ तो सौ बार गिनते हैं
मगर कभी विशेषताओं
पर गौर नहीं करते
आलोचना को छोड़ कभी
तारीफ़ का तौर क्यों नहीं पकड़ते
ठुकराते तो कई बार हैं
मगर स्वीकार नहीं करते
बेसब्री को छोड़ पीछे कभी
सब्र की ओर क्यों नहीं बढ़ते
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तौर(तरीका/ढंग)


