नींद से बोझिल पलकों से अब

सुकून ओझिल होने लगा

रिसते हुए ज़ख्मों का दर्द

अब अंतर्मन को भिगोने लगा


साथ देती परछाइयों में भी

सहसा सबकुछ बिखर गया

छोड़ा जो तुमने साथ मेरा

भीतर सबकुछ सिहर गया


अवसाद ने आकर घेर लिया

उलझनों ने झकझोर दिया

रूकसती क्या हुई तुम्हारी

मुस्कुराहटों ने भी

आना जाना छोड़ दिया

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