गमों के तहख़ाने में
हसी का पहरा रखते हैं
खुद के रहस्यों को
मन की खूटी से लटकाए रखते हैं
लहज़े की बदजुबानी
फितरत पर नकाब लिए चलते हैं
दूसरों की कमियों का
हर पल हिसाब लिए फिरते हैं
अपने सारे एबों को तो नज़रंदाज़ करते हैं
अगले के गुणों का भी तिरस्कार करते है
शक्ल पर नादानी रख
अक्ल से खेल रचते हैं
ये वो जीव है साहब जो
एक चेहरे के पीछे हज़ार चेहरे रखते हैं
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