चुप रहूं तो अच्छी
बोल दूं तो खराब हूं,,
उठाऊं आवाज़ तो बदतमीज़
सह लूं तो लाजवाब हूं
औरों की सुनूं तो आला
खुद की करूं तो अशिष्ट हूं,,
जताऊं ऐतराज तो बेहया
करूं समझौता तो विशिष्ट हूं
समझूं सबकी तो समझदार
न समझूं तो बेकार हूं,,
बताऊं कमी तो बेलिहाज़
करूं तारीफ़ तो बेमिसाल हूं
समझे चाहे कोई भी जैसे
खुली मैं किताब हूं,,
सलीके से पढ़िए मुझे
मैं शख्सियत बे-नक़ाब हूं
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