क्यों अब हम ख़ुद को छलने लगे हैं

अनजानी राहों पर निकलने लगें हैं


जज़्बातों को पहचानने से

अब डरने लगें हैं

अपने ही किए वादों से

अब मुकरने लगें हैं


ज़रा ज़रा सी बातों पर

अब भड़कने लगें हैं

अपने ही अपनों को

अब खटकने लगे हैं


ना जाने क्यों और कैसे

अब हम बदलने लगें हैं

ख्वाहिशों के पंख

अब हकीकतों की

ज़मीन को अखरने लगें हैं

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