जज़्बातों का दिल में हरपल जलता अलाव है

ना जाने कैसा ये उम्र का पड़ाव है..


रोम रोम में बसर करता हरपल इज़्तिराब है

ना जाने कैसा ये उम्र का पड़ाव है...


नज़रों से ओझल है सुकून और

मुस्कुराहटों का अभाव है

ना जाने कैसा ये उम्र का पड़ाव है...


जहन में आया रहता हरपल

अगणित सवालों का सैलाब है

ना जाने कैसा ये उम्र का पड़ाव है...


ख्वाहिशें हैं ज़्यादा और हकीक़तों से अलगाव है

ना जाने कैसा ये उम्र का पड़ाव है....


कश्मकश से भरी है ज़िन्दगी और

दिखता नहीं किसी भी मोड़ पर ठहराव है

ना जाने कैसा ये उम्र का पड़ाव है

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इज़्तिराब(बेचैनी)