कभी यूं भी किसी रोज़ किया कीजिए

बैठ कभी ख़ुद से भी मिला कीजिए


उधड़े हैं जो तार दिल के भीतर

वक्त निकाल उनको सिया कीजिए


कभी यूं भी किसी रोज़ किया कीजिए

औरों को कर अनसुना

ख़ुद की आवाज़ भी सुना कीजिए


छूटे हैं जो ख़्वाब अधूरे

ज़िंदगी की भागम भाग में

हाथ पकड़ उनका

कुछ दूर चला कीजिए


कभी यूं भी किसी रोज़ किया कीजिए

छोड़ रस्म ए रिवाज़ों की दुनिया

चाहतों से ख़ुद की मिला कीजिए


पहुंचाई है जो ठेस ख़ुद को

औरों को खुश रखने की खातिर

मरहम परवाह का उसपर लगाया कीजिए


कभी यूं भी किसी रोज़ किया कीजिए!!!!

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